✍️एक राजनीतिक कविता


उम्मीद है

आप और अधिक
सवर्ण हो चुके होंगे,
और अधिक
हो चुके होंगे
ओबीसी, एस सी,
एस टी।

पहले से अधिक
गहरा हो गया होगा
रंग भगवे का,
हरे का
लाल का
नीले का।

अब और ठान लिया होगा
आपने कि अब
बर्दाश्त नहीं करना है
कोई आघात
अपनी निजी पहचान के खिलाफ
बहुत हो गया, आखिर देश
हमारा भी है।

अभी-अभी आपकी
घबराहट फिर बढ़ा दी गई होगी
कितना कुछ आपका खतरे में है
बता दिया गया होगा और
आपने फिर कमर
कस ली होगी कि अब
चुप नहीं रहना है।

वे सारे मुस्कुराए होंगे जब
आपने तय किया होगा कि
बिजली, पानी, सड़क, रोजगार
एक बार फिर जरा इंतजार
कर लेंगे लेकिन
अपनी पहचान, अपनी जाति, अपना धर्म
बचे पहले, नहीं तो
बचेगा नहीं कुछ भी।

उधर उन्होने उनसे पूछा था
कि कैसे जितोगे इस बार फिर चुनाव
कि कैसे दोगे जवाब अपनी नाकामियों का
उत्तर था, वे प्रश्न ही नहीं होंगे देखना
डर बोए हैं चुपचाप, कुछ सरे आम
देखना तुम उनका उगना।

सारे बुनियादी सवाल
एक बार फिर लगा दिए गए हैं किनारे
नागरिक अपनी पहचान का सवाल
हल करने को उत्सुक है
जी, चुनाव का आखिरी चरण है
मुद्दों पर भारी समीकरण है।

#श्रीशउवाच

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